सोढा परमार राजपूत विरद वखा'ण,,,,,,,नेतसिह सोढा
वंश परमार दातार कुल वाटडी।
पुरापुरी धरम ऐ रीत पारा'।
परमारा सरीखी रही तल प्रथ्वी।
प्रथ्वी सिरै नर परमारा।
जोधारा' जिका'री कीर्ती अजूणी।
हजारा' वर्ष तक चलण हारी।
आबु रा अधपती आद अनादरा।
धरा उजैण रा छत्र धारी।
विक्रमादित्य लै जीत सहै वसुधरा।
कैही राज मै न्याय इन्साफ कीधा।
भौज जगदेव दातार ओपम भडा'।
दान मे शीश बगसीस कीधा'।
जिका'ना घणा धनवाद दीजीयै।
दिनोदिन चढते अमल डौडा।
वंश परमार विरै शाख पैंतीस मा
शिरौमण सूर समसेर सोढा'।
चंदण भड सरीखा अखी जल चारियौ।
विधौगत ख्यात जुग चार वैहसी।
हेम रा पहाड कर वा'टिया हाथ सु'
कालु'झर जीकण री वात कैहसी।
धाट धर धू'स अमराण गढ धारियौ।
मारियो उसर ना खाग मैलै।
वजै निसा'ण हमरौठ वजाडे।
भजाडै शत्रुवा' ली संघ भैलै।।
खि'वरै सरीखा अमर जस खाटवा।
चा'वरी चडतै विरद चायौ।
उझैला' ईदररै उरुप आयौ।
पा'चसौ एक हजार जस पौहर मा'।
खि'वरै कर दिया वाल खाली।
गीत तौ जिका'रा जुगो जुग गाईजै।
हसती कीरत नवखंड हाली।
हिम्मत रा कौट सबल नर हाथला कहाला।
सुजस सुण अंजस किनौ।
अरजण रा'ण चिमनैस नर आज दिन।
लाख पसाव दै सुजस लीनौ।
दान सन्मान विद्वान नर दिसंता'।
रा'स सोढा' तणौ ना'ह राचै।
धर्म रा कोट मनमोट नर एधूला'।
विरद वखा'ण अनौपदान वा'चे।
वंश परमार दातार कुल वाटडी।।।।।।।।।।।।।।।।।।
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